झारखंड आंदोलनकारी महेंद्र सिंह आबुआ दिसुम - आबुआ राइज के सच्चे रहबर

झारखंड आंदोलनकारी महेंद्र सिंह आबुआ

 दिसुम - आबुआ राइज के सच्चे रहबर

कच्चा मकान- पक्का करो

जमींदारों के खिलाफ लड़ाइयां लड़ी, जेल गए

ग्रामसभा बनाकर समानांतर पंचायती व्यवस्था स्थापित किया

16 जनवरी स्मृति शेष



पुष्कर महतो
मानस पलट पर कामरेड महेंद्र सिंह का नाम आते ही एक जोशीला, क्रांतिकारी विचारों से लबरेज, भगवान बिरसा मुंडा के आदर्शों को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ते और बढ़ते जाने वाले व्यक्तित्व के रूप में अंकित होता है. उनकी गाथाएं व यादें दिलो-दिमाग में हमेशा हमेशा जिंदा दस्तावेज के रूप में तरोताजा रहते हैं.कहते हैं शहीद मरते नहीं जिंदा दफनाए जाते हैं कब्र खोद के देख लो, जिंदा पाए जाते हैं.
झारखंड आंदोलनकारी कामरेड महेंद्र सिंह उन्हीं हस्तियों में से एक है. जिनकी आवाज, जिनका जुझारूपन,संसदीय क्रांतिकारी विचार, जिनके वसूल ही एक गरिमा मय पहचान है. झारखंड आंदोलन के अग्रणी नेताओं में क्रांति दूत के रूप में महेंद्र सिंह प्रतिष्ठित रहे हैं.
सहज, सरल, साफगोई कृतित्व - व्यक्तित्व के धनी कॉमरेड महेंद्र सिंह ने झारखंड अलग राज्य की लड़ाई भाकपा माले की छात्र इकाई आईपीएफ के बैनर तले लडी. 14 सितंबर 1992 को रांची के मोरहाबादी मैदान में (झारखंड मजदूर किसान पार्टी झमकिस) की एक बड़ी रैली झारखंड अलग राज्य के निर्माण को लेकर हुई. इस रैली के बाद झमकिस की ताकत और कामरेड महेंद्र सिंह के तेवर उभर कर सामने आए. महेंद्र सिंह के जुझारू तेवर बिहार विधान सभा के अंदर और झारखंड अलग राज्य निर्माण के बाद भी सड़क से लेकर सदन तक यथावत गूंजते रहे. अध्यात्म का मार्ग छोड़कर वे शोषण, दमन और अत्याचार का जमकर प्रतिकार करते. किसानों ,मजदूरों ,वंचितों,अल्पसंख्यकोंऔर गरीबों की लड़ाई पूरी ईमानदारी और सच्चाई के साथ लड़ते थे. उन्हें शिलापट्ट या शिलान्यास की राजनीति पसंद नहीं थी. वह विधानसभा में विधायकों के बीच बटने वाले घड़ियां सोल ब्रीफकेस वगैरह बांटने के सख्त खिलाफ थे.वे उन्हें जनता की गाढ़ी कमाई का लूट और घूस कहते थे. वह सृजनात्मक कार्यों में अभिरुचि रखते थे. इन्हीं अभिरुचिओ ने भीड़ की राजनीति और अन्य नेताओं से उन्हें अलग करते हैं. जन सरोकार के मुद्दे पर वे ईमान से ईमान की रक्षा करते. उनके इमानदारी पर कभी भी किसी वर्ग ने सवाल खड़ा नहीं किया. राज्यसभा के चुनावों में वह स्वयं को अलग रखते.
गिरिडीह और कोडरमा के संसदीय क्षेत्रों में इनके बढ़ते दबदबा से राजनीति में अपराध को महत्व देने वाली ताकते और लोकतंत्र के दुश्मनों के आंखों में महेंद्र सिंह चुभने लगे थे. उनकी बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए 16 जनवरी 2005 को राजनीतिक षड्यंत्रकारियों ने बगोदर विधानसभा क्षेत्र के दुर्गी धावैया में जनसभा को संबोधित कर लौटते वक्त मोटरसाइकिल सवार अपराधियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी. इस फायरिंग में महेंद्र सिंह की शहादत हो जाती है. महेंद्र सिंह की हत्या अंबुझ पहेली बन कर रह गई . इस हत्या में कई बड़े ऐसे नामचीन हस्तियों के नाम सामने आए कि सीबीआई भी उनकी पोल खोल ना सकी. जिन संसदीय परंपरा को ध्वस्त करना चाहते थे, वे तत्व महेंद्र सिंह को लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने देना नहीं चाहते थे. जबकि अप्रत्यक्ष रूप से राजनेता व आईपीएस अधिकारी के नाम की चर्चा आज भी जनश्रुतियों में है. अखबारों के पन्नों में अंकित है. इसके बावजूद झारखंड आंदोलनकारी महेंद्र सिंह के कातिल आज भी जिंदा है. जिन्होंने महेंद्र सिंह के रूप में लोकतंत्र की हत्या की है. गरीबों, मजदूरों व किसानों की आवाज को दबाने की कोशिश की है. लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करने वालों के संघर्ष और शहादत के इतिहास स्वर्णिम अक्षरों में अंकित होते हैं. आज महेंद्र सिंह हमारे बीच नहीं हैं लेकिन लोकतंत्र के अंदर सच्चे पहरूवा के रूप में स्थापित है. संसदीय व्यवस्था व गैर संसदीय लड़ाई की अनुपम उदाहरण है.
महेंद्र सिंह अपने सामाजिक व राजनीतिक क्षेत्र में बिहार राज्य जनवादी देशभक्त मोर्चा बनाकर काम करना आरंभ किया. वर्ष 1952 में जन्मे महेंद्र सिंह आईपीएफ के नेशनल कॉन्फ्रेंस में वर्ष 1984 में भाग लेने के लिए दिल्ली गए थे उनके साथ रातों बिजुलिया के विशुन महतो भी साथ में थे. विशुन महतो के विचार महेंद्र सिंह से काफी मिलते थे.
1988 89 में भाकपा माले से जुड़ गए. महेंद्र सिंह ने अपने आप को सर्व प्रथम स्वतंत्र राजनीतिक हस्ती के रूप में स्थापित किया. वर्ष 1998 में हेसाग गोलीकांड के विरोध में संपूर्ण झारखंड बंद का नेतृत्व किया और राज्य स्तर पर अपनी पहचान बनाई. बताया जाता है कि यह रांची बंद की सफलता इस बात से लगाई जाती है कि चाहो और सन्नाटा पसर गया था. इसके पश्चात राज्य बनने के बाद टपकारा गोलीकांड 2 फरवरी 2001 को हुई जिसका नेतृत्व महेंद्र सिंह ने की. इस कांड के विरोध में विधानसभा का घेराव प्रदर्शन भी जबरदस्त हुआ था पुलिस के द्वारा फायरिंग हुई थी लाठीचार्ज हुए थे भाकपा माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य को जेल हुई थी कई प्रदर्शनकारियों के पैर टूटे थे पूरी तरह से भगदड़ मच गए थे. महेंद्र सिंह की लड़ाई सिर्फ यही तक नहीं रहे उन्होंने बोकारो लेवा टाड़ के विस्थापितों पर सीआरपीएफ के द्वारा किए गए जुल्म के खिलाफ 2004 में अनशन किया.
महेंद्र सिंह समतामूलक समाज के पक्षधर थे उन्होंने जमींदारों के खिलाफ लड़ाईयां लड़ी, हत्या के झूठे मुकदमें चलाकर आजीवन कारावास लादा गया.कारावास भी इनका संघर्ष का केंद्र बन गया.कैदी भी इनके अनुवाई हो गए. वहीं जनवादी ताकतें जेल का दरवाजा टूटेगा - महेंद्र सिंह छूटेगा नारा बुलंद करने लगे.जेल के अंदर और बाहर जनवादी मंडलियों के जोर व शोर के आगे शासन - प्रशासन नतमस्तक हो गए. उन्होंने कच्चा मकान को पक्का करो अभियान चलाया .महेंद्र सिंह ने 20 वर्षों से पंचायत चुनाव नहीं हो पाने की स्थिति में स्वयं ग्राम पंचायत का गठन कर सरकार के समानांतर व्यवस्था स्थापित करने का काम किया. शासक और शोषक वर्ग महेंद्र सिंह से सख्त नाराज रहते थे. जबकि महेंद्र सिंह चाहते थे कि समाज में शांति व्यवस्था समतामूलक समाज के गठन से ही संभव है. सबके साथ न्याय हो गरीब, किसान, मजदूर पर अत्याचार ,शोषण व जुल्म ना हो. कोई वंचित और भूखा ना रहे. अखंड बिहार में वे बगोदर से 1990 व 1995 में चुनाव जीतकर शासन प्रशासन के आंखों के किरकिरी बन गए. 2000 में महेंद्र सिंह को चुनाव हराने के लिए बड़े -बड़े धुरंधर उनकी जनवादी बुलंद आवाज को दबाने बिहार से बगोदर आए.जनवादी ताकतों से बुरी तरह पस्त हो गए. इस बीच 15 नवंबर 2000 को झारखंड अलग राज्य का गठन हो गया. झारखंड अलग राज्य में भाकपा माले की ताकतें दिनों दिन बढ़ने लगी थी.
अमर शहीद बिरसा मुंडा के आबुआ दिसुम - आबुआ राइज के सपनों को मूर्त रूप देते हुए
कामरेड महेंद्र सिं क्रांतिकारी बदलाव व लोकतांत्रिक पथ पर झारखंड चलने को अग्रसर हो ही रहा था कि 16 जनवरी 2005 के इतिहास में संघर्ष और शहादत के अध्याय जुट गए. आज महेंद्र सिंह के नाम सामने आने से लोगों की आंखें नम जरूर है लेकिन व्यापक बदलाव के लिए एक और संघर्ष करने का जज्बा भी जागृत हो उठते हैं. उनके नेक इरादों को चंदन है , वंदन है नमन है।

Post a Comment

0 Comments