दर्पण में मुख और संसार में सुख होता नहीं है : प्रेम शंकर साहु

दर्पण में मुख और संसार 

में सुख होता नहीं 

है : प्रेम शंकर साहु

प्रेम शंकर साहु: सम्पादक, झारखंड संस्कार दीप

दर्पण में मुख और संसार मे सुख होता नही है बस दिखता है जीवन में हमेशा एक दूसरे को समझने का प्रयत्न करे परखने का नहीं सच बोलने के लिए "साहस" चाहिए और झूठ बोलने के लिए "कला" चाहिए हजारों "मिठाइया" चखी है ज़माने में "ख़ुशी" के आंसू से "मीठा" कुछ भी नहीं है "ताक़त" और "पैसा" ज़िन्दगी के फल है जबकि परिवार और मित्र जिन्दगी की जड़ है हम फल के बिना अपने आप को चला सकते है लेकिन जड़ के बिना खड़े भी नहीं हो सकते है "वाणी" में अजीब शक्ति होती है कड़वा बोलने वाले का "शहद" भी नहीं बिकता और मीठा बोलने वाले की मिर्च भी बिक जाती है हथेली तब भी छोटी थी हथेली अब भी छोटी है पहले खुशियां बटोरने में चीजें छूट जातीं थी अब चीजें बटोरने में खुशियां छूट जातीं है यह समाज एक महासागर की तरह है एक लहर आती है चली जाती है दूसरी आ जाती है लेकिन महासागर वैसा ही रहता है हम सब लहर है महासागर नहीं ज़िंदगी की कसौटी पर हर रिश्ता गुज़र गया आज भी कुछ खरे सोने है और कुछ का पानी उतर गया जो व्यक्ति अपना इतिहास भूल जाता है उससे सबक नहीं लेता उसका वर्तमान अंधकारमय और भविष्य नष्ट हो जाता है कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि जीवन का संघर्ष कभी न कभी तो खत्म हो जाएगा,यह जीवन जब तक रहेगा संघर्ष भी हर रोज रूप बदल बदल कर आता रहेगा क्या खूब कहा है किसी ने "जिंदगी" का दूसरा नाम परिवर्तन है अब चाहे वो परिवर्तन आप में हो आपके रिश्तों में हो आपके काम में हो "या" संसार में हो "उसे अपनाना सीखे" एक खुबसूरत मुस्कान के साथ आपका हर पल खुशनुमा गुज़रे!🌹भोर- स्नेहाभिनंदन🌹

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